33 मिनट पहलेलेखक: वीरेंद्र मिश्र
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‘धुरंधर’ में राकेश बेदी के किरदार की काफी तारीफ हो रही है। वो कहते हैं कि उन्हें पहले ऐसा मौका नहीं मिला जिसके वो हकदार थे।
राकेश बेदी अपनी हालिया रिलीज फिल्म ‘धुरंधर’में पाकिस्तानी राजनेता जमील खान के किरदार में नजर आए हैं। ज्यादातर फिल्मों में कॉमिक किरदार निभा चुके एक्टर को इस फिल्म से एक अलग पहचान मिली है। इस फिल्म से पहले राकेश बेदी की ‘चश्मे बद्दूर’, ‘एक दूजे के लिए’ जैसी कई फिल्में चर्चा में रही हैं।
‘एक दूजे के लिए’ का ऐसा प्रभाव था कि इस फिल्म के लिए राकेश बेदी को जान से मारने की धमकियां मिलने लगी थीं। ना सिर्फ फिल्मों में बल्कि टीवी शो में भी राकेश बेदी ने कई किरदार निभाए हैं। राकेश बेदी कहते हैं कि जब उनका टीवी शो ‘ये जो है जिंदगी’ आया, तब पता चला कि टीवी की ताकत कितनी बड़ी है।
इस शो से उन्हें खूब लोकप्रियता मिली है। बावजूद इसके उनके करियर का एक ऐसा भी दौर था जब उनके पास खाने तक के पैसे नहीं थे और एक रुपए में केले खाकर गुजारा किया। जिंदगी में आए तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद राकेश बेदी आज भी अपनी शर्तों पर काम करते हैं।
आज की सक्सेस स्टोरी में हम जानेंगे राकेश बेदी के जीवन और करियर से जुड़ी कुछ खास और रोचक बातें, उन्हीं की जुबानी..

परीक्षा बीच में छोड़कर ड्रामा रिहर्सल के लिए चला गया
मैं दिल्ली के करोल बाग में पला बढ़ा हूं। मेरे पिता जी चाहते थे कि मैं इंजीनियर बनूं, इसलिए मैंने IIT की तैयारी की। लेकिन एंट्रेंस टेस्ट के दिन पेपर देखते ही मुझे लगा कि यह मेरा फील्ड नहीं है। मैंने परीक्षा बीच में छोड़ दी और ड्रामा रिहर्सल के लिए चला गया।
मेरा मानना है कि जिस गली में नहीं जाना, उसमें कदम न रखें। जो सूट न करे, उसमें समय बर्बाद न करें। जैसे, अगर बीवी के लिए 15-20 हजार की साड़ी खरीदनी हो, तो 21 हजार वाली को न देखें। वही रेंज में बेस्ट लें।
मुझे तीन-चार महीने की पढ़ाई के बाद भी 39 सवालों में सिर्फ 7 सही जवाब आ पाते थे। इसलिए समझ गया कि इंजीनियरिंग मेरा क्षेत्र नहीं है, इसलिए मैंने अभिनय का रास्ता चुना।
45-47 साल से लगातार थिएटर कर रहा हूं
मैं गर्व से कहता हूं कि मैं उन चुनिंदा एक्टर्स में से हूं जिन्होंने 45-47 साल लगातार थिएटर किया। फिल्में-सीरियल्स के बावजूद थिएटर छोड़ा नहीं, क्योंकि ये आपको रेलिवेंट रखता है, आज के जमाने से जोड़े रखता है। थिएटर से ही आप अपनी एनर्जी, आवाज, रिफ्लेक्सेस और टैलेंट का सही आकलन कर पाते हैं। बिना इसके एक्टर कैसे शार्प बने रहेंगे?
मेरा एक नाटक है, जिसका नाम ‘मसाज’ है। उसमें 2 घंटे का मेरा सोलो परफॉर्मेंस होता है, जिसमें मैं 24 किरदार निभाता हूं। यह नाटक पिछले 23 सालों से लगातार चल रहा है। लॉकडाउन के समय को छोड़ दें, तो उसके अलावा मेरा कोई भी महीना ऐसा नहीं गया, जब मैंने मंच पर काम न किया हो।

‘मसाज’ नाटक में राकेश बेदी अलग-अलग 24 किरदार निभाते हैं।
पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में पुरानी सीख बेकार लगने लगी
जब मैं दिल्ली में थिएटर कर रहा था, तो लगा कि डायरेक्ट फिल्म इंडस्ट्री में जाऊंगा तो दो नुकसान होंगे। पहला, मेरा कोई सर्कल नहीं बनेगा। दूसरा, कुछ नया नहीं सीख पाऊंगा। इसलिए पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट (एफटीआईआई) गया। वहां ट्रेनिंग हुई तो पुरानी सीख बेकार लगी, नए सिरे से सब सीखना पड़ा। वहां दोस्त बने, जो इंडस्ट्री में साथ चलते हैं।
शोले के प्रोड्यूसर ने दिया पहला मौका
मेरी एक्टिंग की शुरुआत 1979 की फिल्म ‘एहसास’ से हुई। इस फिल्म को ‘शोले’ के प्रोड्यूसर जीपी सिप्पी ने प्रोड्यूस की थी। दरअसल, यह फिल्म मेरे लिए कैंपस प्लेसमेंट जैसा था। पुणे एफटीआईआई कॉन्वोकेशन के समय जेपी सिप्पी उस इवेंट में बतौर चीफ गेस्ट आए थे।
इवेंट में मैंने ‘लव इन पेरिस वॉर इन कच्छ’ नामक थिएटर प्रोडक्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। मेरा प्रदर्शन देखने के बाद सिप्पी साहब ने मुझसे कहा कि वह एक फिल्म बना रहे हैं और मैं उनके एक्टर्स में से एक हूं। हालांकि ‘एहसास’ से पहले ‘हमारे तुम्हारे’ रिलीज हुई थी, जिसमें संजीव कुमार के साथ काम करने का मौका मिला था।

फिल्म ‘चश्मे बद्दूर’ में राकेश बेदी ने ओमी शर्मा का किरदार निभाया था। सई परांजपे के निर्देशन में बनी यह कल्ट फिल्म मानी जाती है।
एफटीआईआई की वजह से मिला था ‘चश्मे बद्दूर’ में मौका
मेरे क्लासमेट DOP सुरेंद्र सैनी थे, उसी साल पास आउट हुए। मैंने एफटीआईआई की उनकी शूट की फिल्मों में काम किया। उनकी वजह से मुझे सई परांजपे की फिल्म ‘चश्मे बद्दूर’ में काम करने का मौका मिला था। सई परांजपे को उन्होंने ही मेरा नाम सजेस्ट किया था। अपना रोल पढ़ा तो पागल हो गया। लगा अच्छी स्क्रिप्ट है।
उस वक्त नहीं पता था कि 40 साल बाद भी इसकी चर्चा होगी। लेकिन इतना मालूम था कि ये साफ-सुथरी, मजेदार, हिलेरियस फिल्म बनेगी। ये टाइमलेस फिल्मों में से एक है।

‘एक दूजे के लिए’ 5 जून 1981 को रिलीज हुई थी। उस दौर की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में से एक रही, जिसने 10 करोड़ से ज्यादा का बिजनेस किया।
‘एक दूजे के लिए’ की रिलीज के बाद जान से मारने की धमकियां मिली थीं
मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा सक्सेस ‘चश्मे बद्दूर’ फिल्म था। इसके बाद बड़ी सफलता ‘एक दूजे के लिए’ को मिली। इस फिल्म में रति अग्निहोत्री और कमल हासन लीड रोल में थे। मैंने ह्यूमरस विलेन का किरदार निभाया था। इस फिल्म के रिलीज के बाद मुझे जान से मारने की धमकियां मिली थीं। क्योंकि उस फिल्म में हीरो-हीरोइन की मौत, मेरी वजह से हुई थी।
फिल्म में मैं भी लड़की से प्यार करता था और उसी वजह से गलतफहमी पैदा करता हूं। मेरा किरदार निगेटिव था, लेकिन उसमें थोड़ा ह्यूमर भी था। उसी किरदार की वजह से दोनों की मौत होती है। वो दौर ही ऐसा था, जब लोग फिल्मों को लेकर जुनून में आ जाते थे।

‘ये जो है जिंदगी’ से टीवी की ताकत का पता चला
‘एक दूजे के लिए’ का ऐसा असर था। इसके अलावा ‘नसीब अपना अपना’ ऐसी कुछ और मेरे करियर की फिल्में खास रही हैं। लेकिन मुझे सबसे बड़ा बदलाव तब दिखा जब मेरा टीवी शो ‘ये जो है जिंदगी’ आया। तब पता चला कि टीवी की ताकत कितनी जबरदस्त है। दो-चार एपिसोड ही आए थे, लोग दीवाने हो गए। जहां जाता, सड़क पर चलता, लोग पीछे-पीछे आते। फोन तो था नहीं, कैमरा लेकर फोटो खींचते, ऑटोग्राफ मांगते या बातें करते। वो सफलता का असली स्वाद था। पॉपुलैरिटी फिल्मों से भी ज्यादा, एक अलग लेवल की थी।
टीवी शो में 30 दिन काम नहीं कर सकता
‘ये जो है जिंदगी’ के बाद मैंने श्रीमान श्रीमती, यस बॉस, हम सब एक हैं, जाने दो भी पारो जैसे कई चर्चित टीवी शो किए। इसके बाद जब मैंने ‘भाबी जी घर पर हैं’ और ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ में छोटे रोल किए तो लोगों ने सवाल किया कि छोटे रोल क्यों? दरअसल, यह मेरी खुद की चॉइस थी। प्रोड्यूसर्स चाहते हैं कि मैं हर एपिसोड में 30 दिन काम करूं, लेकिन मुझे वो सूट नहीं करता।
मुझे थिएटर जारी रखना है, ‘धुरंधर’ जैसी फिल्में करनी हैं, तो समय चाहिए। जो लोग पूरे शो करते हैं, वो अच्छा कर रहे हैं। मुझे फर्क नहीं पड़ता। पैसा कमाना आसान है, लेकिन एक्टर के तौर पर खुद को संतुष्ट न कर पाऊं तो क्या फायदा? अगर सिर्फ पैसा चाहिए तो दूसरा धंधा कर लूंगा, 10 गुना ज्यादा कमा लूंगा। लेकिन मुझे थिएटर, फिल्में, ट्रैवल,ये सब करने हैं, इसलिए टीवी पर छोटे रोल चुनता हूं।
देवानंद साहब खुद सामने से फोन करते थे
आज समय थोड़ा बदल गया है। उस जमाने की कुछ और ही बात थी। देवानंद साहब दुनिया भर में मशहूर सुपरस्टार थे, लेकिन बहुत ही सीधे-साधे इंसान थे। कलाकारों को खुद फोन करते थे। मैंने दो-तीन फिल्में कीं। उस जमाने में गोल डायल वाले फोन होते थे। फोन की घंटी बजती, मैं उठाता था। समाने से आवाज आती थी। “हेलो राकेश, देव हियर!” कोई बीच में नहीं, सीधा बात। इतने बड़े स्टार और खुद सामने से फोन करके बुलाते थे।
यशराज प्रोडक्शन में कभी काम मांगने नहीं गया
अब चीजें काफी बदल गईं हैं। कास्टिंग डायरेक्टर और एजेंसीज आ गईं हैं। समय के साथ बदलाव जरूरी है, क्योंकि एक रोल के लिए 100-100 लोग आ जाते हैं, तो फिल्ट्रेशन होना चाहिए। लेकिन मैंने हमेशा अपनी शर्तों पर जिया। किसी के ऑफिस में काम मांगने कभी नहीं गया। किसी ग्रुप से नहीं जुड़ा कि यशराज में घुस जाऊं और उनकी फिल्में मिलती रहें। ना किसी डायरेक्टर के साथ चिपककर चलता रहा।
अगर किसी को मेरी जरूरत पड़ेगी, तो खुद आएगा। लेकिन उसके लिए तैयार रहना पड़ता है। इसलिए तैयारी हमेशा जारी रखी। जिनके साथ काम किया, उन्हें फोन कर सकता हूं। जैसे आदित्य धर के साथ फिल्म ‘धुरंधर’ में किया है। इस फिल्म से पहले ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ में आदित्य धर के साथ काम कर चुका हूं, तो उनसे काम मांग सकता हूं, लेकिन जिसे नहीं जानता, उसके पास काम मांगने नहीं जाता।

‘धुरंधर’ में राकेश बेदी ने पाकिस्तानी राजनेता जमील खान का किरदार निभाया है।
उतार-चढ़ाव तो जिंदगी का हिस्सा है
हर एक्टर की जिंदगी में उतार-चढ़ाव आते हैं। अमिताभ बच्चन जैसे बड़े स्टार के साथ भी तो ऐसा हुआ था। लंबा समय था जब उन्हें काम नहीं मिल रहा था। ये उतार-चढ़ाव तो जिंदगी का हिस्सा हैं। मेरी भी जिंदगी में काफी उतार-चढ़ाव आए, लेकिन मेरे साथ फर्क ये था कि मेरा थिएटर हमेशा साथ रहा। फिल्में न हों तो मंच पर काम कर लिया। रिहर्सल चलती रहती, दिमाग एक्टिव रहता। मैं लाइन्स याद करता, डिलीवर करता, प्ले करता रहता। काम तो चलता ही रहता था।

केले खाकर रात गुजारी
करियर के शुरुआती दिनों में मेरे पास न काम था, न पैसे। खाने तक के पैसे नहीं थे। बैंक बैलेंस में सिर्फ 1 रुपया बचा था। दो रास्ते थे, रोना या आगे बढ़ना। लेकिन मैंने फैमिली से कभी पैसे नहीं मांगे, सिवाय फिल्म इंस्टीट्यूट की पढ़ाई के। मां को दुख न देने के लिए कुछ न बताया। उस वक्त 1 रुपए में 6 केले मिलते थे। मैंने केले खरीदे, खा लिए और सो गया। सोचा, आज का दिन निकल गया, कल जो होगा देख लेंगे। अगले दिन दोस्त से उधार लिया और आगे बढ़ा।
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मैं दिल्ली के एक स्लम इलाके में पला-बढ़ा, जहां न बिजली थी, न टीवी। हम स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर पढ़ाई करते थे। आसपास के कुछ घरों की हालत हमसे थोड़ी बेहतर थी। वहां बिजली और टीवी भी थी। मैं अक्सर उनके घर जाकर टीवी पर फिल्में देखता था, लेकिन कई बार मुझे आने नहीं देते थे।पूरी खबर पढ़ें….
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