भारत में शहर या गांव में रहने वाले, जानें कौन है सबसे ज्यादा बेरोजगार

भारत में शहर या गांव में रहने वाले, जानें कौन है सबसे ज्यादा बेरोजगार


भारत में रोजगार और बेरोजगारी हमेशा से आम लोगों के लिए एक अहम मुद्दा रहा है. हर परिवार चाहता है कि उसके बच्चों को अच्छी नौकरी मिले और जीवन सुरक्षित रहे. इसी बीच सरकार की ओर से जारी किए गए लेटेस्ट लेबर फोर्स सर्वे के आंकड़ों ने देश में नौकरी की मौजूदा स्थिति को साफ करने की कोशिश की है. इन आंकड़ों से यह समझ आता है कि कितने लोग काम कर रहे हैं, कितने लोग नौकरी की तलाश में हैं और शहरों व गांवों में हालात किस तरह अलग-अलग हैं.

हालिया सर्वे के मुताबिक, भारत में 15 साल या उससे ज्यादा उम्र के लोगों में बेरोजगारी दर लगभग 5 प्रतिशत के आसपास दर्ज की गई है. इसका मतलब यह है कि जो लोग काम करना चाहते हैं, उनमें से एक छोटा लेकिन अहम हिस्सा अब भी नौकरी से बाहर है. संख्या भले ही कम लगे, लेकिन देश की बड़ी आबादी को देखते हुए यह आंकड़ा लाखों लोगों की ज़िंदगी से जुड़ा हुआ है. बेरोजगारी का सीधा असर परिवार की आमदनी, बच्चों की पढ़ाई और भविष्य की योजनाओं पर पड़ता है.

शहरों में रोजगार की स्थिति

अगर शहरों की बात करें तो यहां बेरोजगारी की समस्या गांवों के मुकाबले ज्यादा देखने को मिल रही है. शहरों में पढ़े-लिखे युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन उसी रफ्तार से नौकरियां नहीं बढ़ पा रही हैं. प्राइवेट सेक्टर में कड़ी प्रतिस्पर्धा है और हर उम्मीदवार को मनचाही नौकरी नहीं मिल पाती. कई युवा डिग्री और प्रोफेशनल कोर्स करने के बाद भी लंबे समय तक जॉब सर्च करते रहते हैं. महंगाई और किराए का दबाव भी शहरी बेरोजगारी को और मुश्किल बना देता है, क्योंकि बिना नौकरी के शहर में रहना आसान नहीं होता.

गांवों में रोजगार की हालत

गांवों में बेरोजगारी की दर शहरों से थोड़ी कम जरूर है, लेकिन यहां भी चुनौतियां कम नहीं हैं. ग्रामीण इलाकों में खेती, मजदूरी और छोटे-मोटे कामों के जरिए लोगों को किसी न किसी तरह का रोजगार मिल जाता है. मनरेगा जैसी सरकारी योजनाएं भी गांवों में काम का सहारा देती हैं. हालांकि समस्या यह है कि गांवों में मिलने वाला काम अक्सर अस्थायी होता है और उससे होने वाली कमाई सीमित रहती है. इसी वजह से बहुत से लोग बेहतर आमदनी की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हो जाते हैं.

लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन का सच

लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट यह बताता है कि कितने लोग काम कर रहे हैं या काम ढूंढ रहे हैं. मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, देश में लगभग आधी से थोड़ी ज्यादा आबादी है रोजगार से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है. पुरुषों की भागीदारी महिलाओं के मुकाबले ज्यादा है, जबकि महिलाओं का बड़ी संख्या में रोजगार से बाहर रहना अब भी एक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है. अगर महिलाओं की भागीदारी बढ़े, तो देश की आर्थिक स्थिति को भी मजबूती मिल सकती है.

युवाओं की बढ़ती चिंता

बेरोजगारी का सबसे ज्यादा असर युवाओं पर पड़ता है. पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी न मिलना उन्हें मानसिक तनाव में डाल देता है. खासकर शहरों में युवा बेरोजगारी एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है. अनुभव की मांग, सीमित पद और बढ़ती प्रतिस्पर्धा की वजह से युवा लंबे समय तक इंतजार करने को मजबूर हैं.

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